बुधवार, 9 मई 2012


     सूरज 
बाहर  खड़ा था सूरज 
रोज दस्तक देता 
भीतर आने को 
मन के द्वार बंद थे 
रोज सुबह पहली किरण को भेज देता 
देखने को कही खुला है द्वार 
और हम द्वार बंद किये 
भीतर के अंधकार को 
जिए जा रहे थे 
तभी एक दिन बंद द्वार 
खुल गए अचानक 
और किरण के संग संग 
पूरा का पूरा सूरज 
भीतर आया गया 
कौधने लग गया 
असीम प्रकाश 
आज भी सूरज बहार ही है 
मगर मन और तन रोशन हैं 
सूरज की वह पहली ज्ञान की किरण 
और पूरा सूरज भीतर आ गया
                             नीरजा 

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