सूरज
बाहर खड़ा था सूरज
रोज दस्तक देता
भीतर आने को
मन के द्वार बंद थे
रोज सुबह पहली किरण को भेज देता
देखने को कही खुला है द्वार
और हम द्वार बंद किये
भीतर के अंधकार को
जिए जा रहे थे
तभी एक दिन बंद द्वार
खुल गए अचानक
और किरण के संग संग
पूरा का पूरा सूरज
भीतर आया गया
कौधने लग गया
असीम प्रकाश
आज भी सूरज बहार ही है
मगर मन और तन रोशन हैं
सूरज की वह पहली ज्ञान की किरण
और पूरा सूरज भीतर आ गया
नीरजा
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