शनिवार, 5 मई 2012





वर्तमान की यह यात्रा 

मुक्ति यात्रा की कोई कड़ी है ही 

गुरु का ज्ञान इस यात्रा को उददेश्य दे जाता है 
और चल पड़ता है प्राणी का अचेतन 
चेतन होने को सचेतन के साथ 
स्वप्नों की संरचना को छोड़
जान लेता है जीवन की क्षण भंगुरता को 
कहाँ हो पाएंगे ये दिवास्वपन 
पूरे हो भी जाएँ 
तो क्या सदा साथ रहेंगे तुम्हारे ?

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