नारी
सुहागिन कहलाते हुए
एक असहनीय पीड़ा को
ह्रदय में समेटे हुए
जीना पडा संसार में
बस इक आस के सहारे
दो रोटी के लिए रहती हूँ
पति नाम के अजनबी के द्वारे
बहुत कठिन है यह पल
क्या यही आदमी था कल
और आज क्या हो गया
जिंदगी की भागदौड में
कहीं अपने ही हाथों खो गया
खत्म हो गया सब
रह गई वीरानियाँ
करता है दिल भीतर क्रंदन
और रिसते हैं जख्म
जो दिखाई भी नहीं देते
मरहम भी नहीं
मेहरम भी नहीं
वजूद ही जब मिट गया
मेरी पहचान भी नहीं !!!!
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