मंगलवार, 1 मई 2012



    नारी 


व्यथा से भरी हुई 

सुहागिन कहलाते हुए 

एक असहनीय पीड़ा को 

ह्रदय में समेटे हुए 

जीना पडा संसार में 

बस इक आस के सहारे 

दो रोटी के लिए रहती हूँ 

पति  नाम के अजनबी के द्वारे 

बहुत कठिन है यह पल 

क्या यही आदमी था कल 

और आज क्या हो गया 

जिंदगी की भागदौड में 

कहीं अपने ही हाथों खो गया 

खत्म हो गया सब 

रह गई वीरानियाँ 

करता है दिल भीतर क्रंदन 

और रिसते हैं जख्म 

जो दिखाई भी नहीं देते 

मरहम भी नहीं 

मेहरम भी नहीं 

वजूद ही जब मिट गया 

 मेरी पहचान भी नहीं !!!!


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