सोमवार, 30 अप्रैल 2012



बड़े बड़े सुखों की चाह में

हम छोटे सुख को भूल गए

दिन और रात की चकाचोंध में

हम सुबह शाम को भूल गए

याद, है कब सूरज देखा था

संध्या को जब चाँद उगा था

देखा था माँ का सूट नया

यां बहन भी भूखी बैठी थी 

कब देखा   था पत्नी को जी भर के

सारे छोटे सुख तुम भूल गए 

क्या याद है तुम को कब

ली थी माथे कि बिंदिया

और रचाई थी मेहँदी अपने हाथों से

बिंदिया और मेहँदी पूछती है

अपना नाम जो इस में लिखा था

बिंदिया को लगाना भूल गए

ए हमसफ़र तुम हमराह तो बने 

पर हमदर्द क्यूँ बनना भूल गए

                    ....द्वारा नीरजा 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें