सोमवार, 30 अप्रैल 2012

                                               प्रेम  


प्रेम बंधन है ...प्रेम एक दुसरे को गुलाम बनाता है ...जब इसी गुलामी के के बंधन किसी वजह से कमजोर पड़ते हैं तो तिलमिलाहट होती है ...प्रेमी नहीं चाहते अपने एकाधिकार को किसी से बाँटना ....पर यूँ भी देखें तो क्या बाँध पाते हैं प्रेम में किसी को ....प्रेम का बसेरा तो केवल मन ही है ....मन तो बंधता नहीं ....सारे बंधन तो तन पर ही कसे जाते हैं ....प्रेम के नाम पर तन ही बाँधा जाता है ....जिम्मेदारियों में....बंधनों में ....और समाज की तथाकथित रूढ़िवादी परम्पराओं का तन पर पहरा बिठा दिया जाता है
प्रेम को मैंने महसूस किया है ...वह आलौकिक है जो बिना किसी दबाव याँ स्वार्थ के होता है ....प्रेम त्याग में है ...बंधन में नहीं ....सम्पूर्ण में को प्रेम में बहा देने का नाम ही प्रेम है .....और इस परिभाषा को पूर्णता देने के लिए प्रेम की गहराई में उतरना होगा !!!!!!

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