अंतर्चेतना
मंगलवार, 3 अप्रैल 2012
आज एक और दिन बीत रहा था,
मैने बहुत रोकना चाहा पर वो फिर डूब गया ।
ये बेहोश रात आज फिर छा रही थी,
चेतना को अपने अधीन कर मुझे भी बेहोश कर रही थी,
बस एक तेरे खयाल ने मुझे बचा लिया,
रात सोती रही
और मैं जागती रही ।
नीरजा
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