मन
मन था मेरा
पर नहीं था साथ मेरे
नहीं था हाथ मेरे
भागता निरन्तर प्रवाह में
प्रबल वेग के साथ
बरसाती नदिया की मानिंद
अन्जने में ,अनचाहे ही
धाराओं के प्रबल वेग में
किनारों को भी तोड़ता हुआ
इक रहनुमा से मुलाकात हुई
बदल दी जिसने दिशा मेरी
और अब
यह बहता है
प्रेम रस की धारा बन कर
अपने सागर की दिशा में
अविरल
होगा मिलन कभी न कभी
यूँ ही
और अब मन है मेरा
पर अपने विचारों की भीड़ से दूर
उमंगो में लरजता हुआ
पर अब मेरा नहीं.........नीरजा
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