दर्द
इस भटकती भीड़ में ...
.एक दिशा को तलाशते हुए मैं....
अपना आस्तित्व बनाये रखने की आस में.....
अपने ही हाथों शोषित हुई हूँ मैं...
खाए हैं दिल पे जख्म ..
जो आज भी रिसते हैं ...
दर्द होता है बेइंतेहा ....
दरकता है भीतर कुछ ...
.फिर भी जी रही हूँ ...
शायद किसी आस पर ....
किसी मरहम कि तलाश में...
.जो मेरे इन जख्मों को भर दे ....
मगर अब यह नासूर हैं ....
अपनों के दिए हुए .....
रिसते रहेंगे सदा ...
जो न भर सकेंगे कभी ...
.न मिलेगी दिशा ....
खत्म हो जायेगी कतरा कतरा ...
.मेरी मोहब्बत मेरा जूनून न बन जाना .....
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