मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

सिसकता है मेरे भीतर का 

प्रेमी पंछी

इक नयी उड़ान के लिए 

सुबह से शाम तक

आस की आँखों में पहचान लिए 

खुला था इक दिन 

यह पिंजरा भी अचानक 

और उड़ान के लिए फैलाये थे पंख 
मगर
मगर मैं भूल चुकी थी 

खुले आसमान की उड़ान 

आज इसी तरह 

फिर से पिंजरे की सलाखों में ढूँढती रहती हूँ 

उन पलों का इंतज़ार है 

जब पाऊँगी मैं
खुद को कभी 

खुले आसमान में
न जाने कब तक जारी रहेगा 

यह सिलसिला 

अंतहीन यात्रा का अंतहीन इंतज़ार 

                ......द्वारा  नीरजा 


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