सिसकता है मेरे भीतर का
प्रेमी पंछी
इक नयी उड़ान के लिए
सुबह से शाम तक
आस की आँखों में पहचान लिए
खुला था इक दिन
यह पिंजरा भी अचानक
और उड़ान के लिए फैलाये थे पंख
मगर
मगर मैं भूल चुकी थी
खुले आसमान की उड़ान
आज इसी तरह
फिर से पिंजरे की सलाखों में ढूँढती रहती हूँ
उन पलों का इंतज़ार है
जब पाऊँगी मैं
खुद को कभी
खुले आसमान में
न जाने कब तक जारी रहेगा
यह सिलसिला
अंतहीन यात्रा का अंतहीन इंतज़ार
......द्वारा नीरजा
सिसकता है मेरे भीतर का
मगर मैं भूल चुकी थी
खुले आसमान की उड़ान
आज इसी तरह
फिर से पिंजरे की सलाखों में ढूँढती रहती हूँ
उन पलों का इंतज़ार है
जब पाऊँगी मैं
खुद को कभी
खुले आसमान में
न जाने कब तक जारी रहेगा
यह सिलसिला
अंतहीन यात्रा का अंतहीन इंतज़ार
......द्वारा नीरजा
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